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उपरोक्त पंक्ति में क्लिष्टत्व दोष है जिसका अर्थ कठिनाई से होता है अर्थात् काव्य में चमत्कारपूर्ण ढंग से अर्थ प्रकट करने के लिए जिस दृष्टिकूट पद शैली को अपनाया जाता है। वहाँ पर क्लिष्टत्व दोष होता है। यहाँ पर 'तरु-रिपु, रिपु-धर देखि के विरहिनी तिय अकुलाय' का अर्थ है वृक्ष की शत्र अग्नि, अग्नि का शत्रु जल और उस जल को धारण करने वाला बादल को देखकर विरहिणी स्त्री व्याकुल हो जाती है। जो सामान्य बोध के परे है। अतः यहाँ क्लिष्टत्व काव्यदोष है।
सूत्रकार वैदग्धाभंगी भणिति (चमत्कार पूर्व कथन-) कुंतक
अदोष/निर्दोषं गुणवत्त्काव्यमलंकारलकृतम्- भोजराज
तस्य कवेः कर्म स्मृतं काव्यम् - राजशेखर
रमणीयार्थ-प्रतिपादक : शब्द: काव्यम् - जगन्नाथ
* गोस्वामी तुलसीदास का निधन वाराणसी के 'अस्सी घाट' पर हुआ।
अन्य तथ्य –
* जन्म - कासगंज , उत्तर प्रदेश (1511 ई०)
* मृत्यु - वाराणसी (1623 ई०)
* गुरु – नरहरिदास
* कृतियाँ - रामचरितमानस, विनयपत्रिका, दोहावली, कवितावली, हनुमान चालीसा, वैराग्य सन्दीपनी, जानकी मंगल, पार्वती मंगल
* वाक्य विग्रह के अंतर्गत किसी वाक्य के सभी अंगों को अलग-अलग कर उनके पारस्परिक संबंध दिखलाये जाते हैं।
* हिन्दी में वाक्य विग्रह को वाक्य विश्लेषण और वाक्य-विभाजन कहते हैं।
निम्नलिखित रचनाकार, उनकी रचनाएं - रचनाकार
मोहन राकेश - आखिरी चट्टाना या वृत्तान्त)
अमृत राय - कलम का सिपाही (प्रेमचन्द्र की जीवनी)
तुफानों के बीच (रिपोर्ताज)
राहुल सांकृत्यायन - किन्नर देश में (यात्रा वृत्तांत)
'यात्री-मित्र' सत्यदेव परिव्राजक द्वारा लिखा यात्रा वृत्त है। यात्रा सम्बन्धी इनकी अन्य कृतियाँ है- मेरी कैलाश यात्रा- 1915, मेरी जर्मन यात्रा-1926, यात्री मित्र-1936 आदि।
* सूफी संतों की शैली 'मसनवी' है। जिस रचना के प्रारंभ में ईश वंदना, पैगंबर की स्तुति एवं शाहेवक्त की प्रशंसा की जाती है वह मसनवी शैली कहलाती है।
* मसनवी फारसी साहित्य में एक प्रकार का ग्रंथ होता है। कई लेखकों की मसनवियाँ मिलती हैं।
'राधेश्याम गीत गा रहा था।' वाक्य में क्रिया से कार्य के अतीत में आरंभ होकर, अभी पूरा न होने का पता चल रहा है। अतः ये अपूर्ण भूतकाल की क्रिया है।अपूर्ण भूतकाल - जिस क्रिया से यह ज्ञात हो कि भूतकाल में कार्य सम्पन्न नहीं हुआ था - अभी चल रहा था, उसे अपूर्ण भूत कहते हैं।अन्य तथ्य - जिससे क्रिया से कार्य की समाप्ति का बोध हो, उसे भूतकाल की क्रिया कहते हैं।भूतकाल के छह भेद होते है-(i)सामान्य भूतकाल(ii)आसन भूतकाल(iii)पूर्ण भूतकाल(iv)अपूर्ण भूतकाल(v)संदिग्ध भूतकाल(vi)हेतुहेतुमद् भूत(i)सामान्य भूतकाल - जिससे भूतकाल की क्रिया के विशेष समय का ज्ञान न हो, उसे सामान्य भूतकाल कहते हैं।(ii)आसन्न भूतकाल -क्रिया के जिस रूप से यह पता चले कि क्रिया अभी कुछ समय पहले ही पूर्ण हुई है, उसे आसन्न भूतकाल कहते हैं।(iii)पूर्ण भूतकाल - क्रिया के उस रूप को पूर्ण भूत कहते है, जिससे क्रिया की समाप्ति के समय का स्पष्ट बोध होता है कि क्रिया को समाप्त हुए काफी समय बीता है।(iv)संदिग्ध भूतकाल - भूतकाल की जिस क्रिया से कार्य होने में अनिश्चितता अथवा संदेह प्रकट हो, उसे संदिग्ध भूतकाल कहते है।(v)हेतुहेतुमद् भूतकाल - यदि भूतकाल में एक क्रिया के होने या न होने पर दूसरी क्रिया का होना या न होना निर्भर करता है, तो वह हेतुहेतुमद् भूतकाल क्रिया कहलाती है।
● 'आस्था और चिंतन' नामक निबंध-संग्रह विवेकी राय का है।
● इसका प्रकाशन 1991 में हुआ था।
● विवेकी राय के अन्य निबंध संग्रह हैं -किसानों का देश (1956), गांवों की दुनिया (1957), त्रिधारा (1958), फिर बैतलवा डाल पर (1962), जगत तपोवन सो कियो (1995)
राजभाषा अधिनियम 1963 के अंतर्गत राजभाषा के प्रयोजन के लिए देश को 'क क्षेत्र', 'ख क्षेत्र' और . 'ग क्षेत्र' - तीन क्षेत्रों में बांटा गया है। ग क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले राज्य कर्नाटक, केरल , उड़ीसा आदि
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