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CTET 2019 Hindi Test - 15
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CTET 2019 Hindi Test - 15
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    हिंदी शिक्षण में नवाचार नही है?

    Solutions

    हिंदी शिक्षण में नवाचार सूचनाओं का आदान-प्रदान नहीं है। सूचनाओं का आदा-प्रदान बहुत समय चला आ रहा है। हिंदी शिक्षण में केवल सूचनाएँ ही नहीं शिक्षा का आधार होती है। हिंदी शिक्षण एक विस्तृत विषय है। जिसका समावेशन केवल सूचनाओं में नहीं किया जा सकता है।

     

  • Question 2/10
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    शिक्षक की स्वयं की भाषा प्रयोग की कुशलता।

    Solutions

    शिक्षक की भाषा प्रयोग की कुशलता का प्रभाव बच्चों पर अधिक पड़ता है क्योंकि बच्चा भाषा अनुकरण के माध्यम से सीखता है। जैसे शिक्षक भाषा का प्रयोग करेगा वैसे ही बच्चा भाषा सीखेगा इसलिए भाषा का प्रयोग आदर्श रूप में करना चाहिए।

     

  • Question 3/10
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    Directions For Questions

    निर्देश: गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्न में सबसे उचित विकल्प चुनिए। 

    मैं दिखाना चाहती हूँ कि हम आलोचनात्मक शिक्षाशास्त्र के जरिए चीजों पर पर्दा डालने की कोशिश नहीं करते, क्योंकि अब तो यही चलन बन गया है। हम आमतौर पर कहते हैं - अरे सीखने का कितना ख़ुशनुमा माहौल है और देखो, बच्चे कैसे-कैसे प्रयोग कर रहे हैं,मगर अब ये ख़ुशनुमा ढंग से सीखना भी एक ढर्रा बन गया है, इसको बहुत बेजान बना दिया गया है। हम अकसर सोचते हैं कि बस कोई गतिविधि करना ही काफी है, भले ही वो बिल्कुल निरर्थक हो, भले ही बच्चे उसके जरिए कुछ न सीख रहे हों। बस गतिविधियाँ करवाने की मारामारी मची हुई है। आज हमारे यहाँ यही हालात हैं। इसलिए मुझे लगता है कि हमें इस बारे में एक नए सिरे से सोचना चाहिए। बेशक, गतिविधि का महत्त्व है मगर बच्चों को वो चीजे मत सिखाइए जो बाद में आनी हैं। मसलन, उन्हें नंबर लाइन सिखाकर उसके आधार पर टाइम लाइन की बात मत कीजिए। हर चीज को एक संदर्भ में कीजिए। इसकी वजह यह है कि बच्चे इसी तरह सीखते हैं। संख्याएँ संदर्भ से ही आती हैं। संख्या एक बहुत अमूर्त धारणा है। एक बच्चे के लिए ‘दो’ समझना अमूर्त बात है। वह कैसे समझेगा कि किसी चीज के ‘दो’ होने का क्या मतलब है?

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    बच्चों के सीखने के तरीके में सबसे अधिक क्या महत्त्वपूर्ण है?

    Solutions

    गद्यांश से - बच्चे संदर्भ परक ज्ञान, किसी संदर्भ को ध्यान में रख के ही करते और बच्चों के सीखने की तरीके में सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण संदर्भ ही है।

     

  • Question 4/10
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    Directions For Questions

    निर्देश: गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्न में सबसे उचित विकल्प चुनिए। 

    मैं दिखाना चाहती हूँ कि हम आलोचनात्मक शिक्षाशास्त्र के जरिए चीजों पर पर्दा डालने की कोशिश नहीं करते, क्योंकि अब तो यही चलन बन गया है। हम आमतौर पर कहते हैं - अरे सीखने का कितना ख़ुशनुमा माहौल है और देखो, बच्चे कैसे-कैसे प्रयोग कर रहे हैं,मगर अब ये ख़ुशनुमा ढंग से सीखना भी एक ढर्रा बन गया है, इसको बहुत बेजान बना दिया गया है। हम अकसर सोचते हैं कि बस कोई गतिविधि करना ही काफी है, भले ही वो बिल्कुल निरर्थक हो, भले ही बच्चे उसके जरिए कुछ न सीख रहे हों। बस गतिविधियाँ करवाने की मारामारी मची हुई है। आज हमारे यहाँ यही हालात हैं। इसलिए मुझे लगता है कि हमें इस बारे में एक नए सिरे से सोचना चाहिए। बेशक, गतिविधि का महत्त्व है मगर बच्चों को वो चीजे मत सिखाइए जो बाद में आनी हैं। मसलन, उन्हें नंबर लाइन सिखाकर उसके आधार पर टाइम लाइन की बात मत कीजिए। हर चीज को एक संदर्भ में कीजिए। इसकी वजह यह है कि बच्चे इसी तरह सीखते हैं। संख्याएँ संदर्भ से ही आती हैं। संख्या एक बहुत अमूर्त धारणा है। एक बच्चे के लिए ‘दो’ समझना अमूर्त बात है। वह कैसे समझेगा कि किसी चीज के ‘दो’ होने का क्या मतलब है?

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    गद्यांश में किसके ढर्रा बन जाने की बात की गई है?

    Solutions

    वर्तमान समय में बच्चे विभिन्न गतिविधियों द्वारा सरलता से सीखते हैं। इस प्रकार यह खुशनुमा ढंग से सीखने की रीति या ढर्रा बन गया है, गद्यांश में इसी बात पर विशेष बल दिया गया है।

     

  • Question 5/10
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    Directions For Questions

    निर्देश: गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्न में सबसे उचित विकल्प चुनिए। 

    मैं दिखाना चाहती हूँ कि हम आलोचनात्मक शिक्षाशास्त्र के जरिए चीजों पर पर्दा डालने की कोशिश नहीं करते, क्योंकि अब तो यही चलन बन गया है। हम आमतौर पर कहते हैं - अरे सीखने का कितना ख़ुशनुमा माहौल है और देखो, बच्चे कैसे-कैसे प्रयोग कर रहे हैं,मगर अब ये ख़ुशनुमा ढंग से सीखना भी एक ढर्रा बन गया है, इसको बहुत बेजान बना दिया गया है। हम अकसर सोचते हैं कि बस कोई गतिविधि करना ही काफी है, भले ही वो बिल्कुल निरर्थक हो, भले ही बच्चे उसके जरिए कुछ न सीख रहे हों। बस गतिविधियाँ करवाने की मारामारी मची हुई है। आज हमारे यहाँ यही हालात हैं। इसलिए मुझे लगता है कि हमें इस बारे में एक नए सिरे से सोचना चाहिए। बेशक, गतिविधि का महत्त्व है मगर बच्चों को वो चीजे मत सिखाइए जो बाद में आनी हैं। मसलन, उन्हें नंबर लाइन सिखाकर उसके आधार पर टाइम लाइन की बात मत कीजिए। हर चीज को एक संदर्भ में कीजिए। इसकी वजह यह है कि बच्चे इसी तरह सीखते हैं। संख्याएँ संदर्भ से ही आती हैं। संख्या एक बहुत अमूर्त धारणा है। एक बच्चे के लिए ‘दो’ समझना अमूर्त बात है। वह कैसे समझेगा कि किसी चीज के ‘दो’ होने का क्या मतलब है?

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    गद्यांश के अनुसार.........

    Solutions

    गद्यांश के अनुसार गतिविधियों द्वारा बच्चे में नया सीखने के प्रति उत्सुकता पैदा होती है। अतः बच्चों को अधिक से अधिक गतिविधियाँ उपलब्ध करानी चाहिए तथा ये गतिविधियाँ सार्थक होनी चाहिए।

     

  • Question 6/10
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    Directions For Questions

    निर्देश: गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्न में सबसे उचित विकल्प चुनिए। 

    मैं दिखाना चाहती हूँ कि हम आलोचनात्मक शिक्षाशास्त्र के जरिए चीजों पर पर्दा डालने की कोशिश नहीं करते, क्योंकि अब तो यही चलन बन गया है। हम आमतौर पर कहते हैं - अरे सीखने का कितना ख़ुशनुमा माहौल है और देखो, बच्चे कैसे-कैसे प्रयोग कर रहे हैं,मगर अब ये ख़ुशनुमा ढंग से सीखना भी एक ढर्रा बन गया है, इसको बहुत बेजान बना दिया गया है। हम अकसर सोचते हैं कि बस कोई गतिविधि करना ही काफी है, भले ही वो बिल्कुल निरर्थक हो, भले ही बच्चे उसके जरिए कुछ न सीख रहे हों। बस गतिविधियाँ करवाने की मारामारी मची हुई है। आज हमारे यहाँ यही हालात हैं। इसलिए मुझे लगता है कि हमें इस बारे में एक नए सिरे से सोचना चाहिए। बेशक, गतिविधि का महत्त्व है मगर बच्चों को वो चीजे मत सिखाइए जो बाद में आनी हैं। मसलन, उन्हें नंबर लाइन सिखाकर उसके आधार पर टाइम लाइन की बात मत कीजिए। हर चीज को एक संदर्भ में कीजिए। इसकी वजह यह है कि बच्चे इसी तरह सीखते हैं। संख्याएँ संदर्भ से ही आती हैं। संख्या एक बहुत अमूर्त धारणा है। एक बच्चे के लिए ‘दो’ समझना अमूर्त बात है। वह कैसे समझेगा कि किसी चीज के ‘दो’ होने का क्या मतलब है?

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    बच्चों के लिए क्या मुश्किल है?

    Solutions

    प्राथमिक स्तर पर बच्चे संख्या जैसी अमूर्त अवधारणा को समझने में कठिनाई महसूस करते हैं, क्योंकि बच्चों को यह पता नहीं होता कि वास्तव में उसका ‘अर्थ’ या ‘व्यावहारिक’ उपयोग क्या है। यदि बच्चे को ‘दो’ की संख्या को समझाया जा रहा है, तो उसे व्यवहारिक रूप अर्थात् मूर्त रूप से समझना जरूरी है तभी वह ‘दो’ की अवधारणा को ‘आत्मसात’ कर सकेगा।

     

  • Question 7/10
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    Directions For Questions

    निर्देश: गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्न में सबसे उचित विकल्प चुनिए। 

    मैं दिखाना चाहती हूँ कि हम आलोचनात्मक शिक्षाशास्त्र के जरिए चीजों पर पर्दा डालने की कोशिश नहीं करते, क्योंकि अब तो यही चलन बन गया है। हम आमतौर पर कहते हैं - अरे सीखने का कितना ख़ुशनुमा माहौल है और देखो, बच्चे कैसे-कैसे प्रयोग कर रहे हैं,मगर अब ये ख़ुशनुमा ढंग से सीखना भी एक ढर्रा बन गया है, इसको बहुत बेजान बना दिया गया है। हम अकसर सोचते हैं कि बस कोई गतिविधि करना ही काफी है, भले ही वो बिल्कुल निरर्थक हो, भले ही बच्चे उसके जरिए कुछ न सीख रहे हों। बस गतिविधियाँ करवाने की मारामारी मची हुई है। आज हमारे यहाँ यही हालात हैं। इसलिए मुझे लगता है कि हमें इस बारे में एक नए सिरे से सोचना चाहिए। बेशक, गतिविधि का महत्त्व है मगर बच्चों को वो चीजे मत सिखाइए जो बाद में आनी हैं। मसलन, उन्हें नंबर लाइन सिखाकर उसके आधार पर टाइम लाइन की बात मत कीजिए। हर चीज को एक संदर्भ में कीजिए। इसकी वजह यह है कि बच्चे इसी तरह सीखते हैं। संख्याएँ संदर्भ से ही आती हैं। संख्या एक बहुत अमूर्त धारणा है। एक बच्चे के लिए ‘दो’ समझना अमूर्त बात है। वह कैसे समझेगा कि किसी चीज के ‘दो’ होने का क्या मतलब है?

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    अक्सर लोग क्या सोचते हैं?

    Solutions

    गतिविधियों द्वारा विद्यालय में शिक्षक बच्चे को सीखाते हैं तथा शिक्षण प्रक्रिया पूरी करते हैं। अतः अक्सर लोग सोचते है कि गतिविधि कराना ही पर्याप्त है किन्तु गतिविधि यदि सउद्देश्य नहीं होगी तो उसके आपेक्षिक परिणाम की कल्पना भी नहीं की जा सकती है।

     

  • Question 8/10
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    निर्देश: गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्न में सबसे उचित विकल्प चुनिए। 

    मैं दिखाना चाहती हूँ कि हम आलोचनात्मक शिक्षाशास्त्र के जरिए चीजों पर पर्दा डालने की कोशिश नहीं करते, क्योंकि अब तो यही चलन बन गया है। हम आमतौर पर कहते हैं - अरे सीखने का कितना ख़ुशनुमा माहौल है और देखो, बच्चे कैसे-कैसे प्रयोग कर रहे हैं,मगर अब ये ख़ुशनुमा ढंग से सीखना भी एक ढर्रा बन गया है, इसको बहुत बेजान बना दिया गया है। हम अकसर सोचते हैं कि बस कोई गतिविधि करना ही काफी है, भले ही वो बिल्कुल निरर्थक हो, भले ही बच्चे उसके जरिए कुछ न सीख रहे हों। बस गतिविधियाँ करवाने की मारामारी मची हुई है। आज हमारे यहाँ यही हालात हैं। इसलिए मुझे लगता है कि हमें इस बारे में एक नए सिरे से सोचना चाहिए। बेशक, गतिविधि का महत्त्व है मगर बच्चों को वो चीजे मत सिखाइए जो बाद में आनी हैं। मसलन, उन्हें नंबर लाइन सिखाकर उसके आधार पर टाइम लाइन की बात मत कीजिए। हर चीज को एक संदर्भ में कीजिए। इसकी वजह यह है कि बच्चे इसी तरह सीखते हैं। संख्याएँ संदर्भ से ही आती हैं। संख्या एक बहुत अमूर्त धारणा है। एक बच्चे के लिए ‘दो’ समझना अमूर्त बात है। वह कैसे समझेगा कि किसी चीज के ‘दो’ होने का क्या मतलब है?

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    ‘गतिविधियाँ करवाने की मारामारी मची हुई है’ का आशय है

    Solutions

    बच्चों द्वारा करायी गयी गतिविधि सदैव सउद्देश्य ही होनी चाहिए तथा उसकी सार्थकता अत्यावश्यक है। सभी लोग औरों की देखा-देखी निरर्थक गतिविधियाँ भी करवाने में लगे हुए हैं। इस प्रकार इस प्रक्रिया की मारामारी मची हुई है।

     

  • Question 9/10
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    निर्देश: गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्न में सबसे उचित विकल्प चुनिए। 

    मैं दिखाना चाहती हूँ कि हम आलोचनात्मक शिक्षाशास्त्र के जरिए चीजों पर पर्दा डालने की कोशिश नहीं करते, क्योंकि अब तो यही चलन बन गया है। हम आमतौर पर कहते हैं - अरे सीखने का कितना ख़ुशनुमा माहौल है और देखो, बच्चे कैसे-कैसे प्रयोग कर रहे हैं,मगर अब ये ख़ुशनुमा ढंग से सीखना भी एक ढर्रा बन गया है, इसको बहुत बेजान बना दिया गया है। हम अकसर सोचते हैं कि बस कोई गतिविधि करना ही काफी है, भले ही वो बिल्कुल निरर्थक हो, भले ही बच्चे उसके जरिए कुछ न सीख रहे हों। बस गतिविधियाँ करवाने की मारामारी मची हुई है। आज हमारे यहाँ यही हालात हैं। इसलिए मुझे लगता है कि हमें इस बारे में एक नए सिरे से सोचना चाहिए। बेशक, गतिविधि का महत्त्व है मगर बच्चों को वो चीजे मत सिखाइए जो बाद में आनी हैं। मसलन, उन्हें नंबर लाइन सिखाकर उसके आधार पर टाइम लाइन की बात मत कीजिए। हर चीज को एक संदर्भ में कीजिए। इसकी वजह यह है कि बच्चे इसी तरह सीखते हैं। संख्याएँ संदर्भ से ही आती हैं। संख्या एक बहुत अमूर्त धारणा है। एक बच्चे के लिए ‘दो’ समझना अमूर्त बात है। वह कैसे समझेगा कि किसी चीज के ‘दो’ होने का क्या मतलब है?

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    ‘अमूर्त’ का विलोम है।

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    विलोम शब्द, शब्दों के विपरीर्थक होते हैं। उदाहरणतः दिन-रात, काला-सफेद। अमूर्त का अर्थ है साकार न हो जबकि मूर्त का अर्थ साकार होता है। अतः ‘अमूर्त’ शब्द का विलोम ‘मूर्त’ है।

     

  • Question 10/10
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    निर्देश: गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्न में सबसे उचित विकल्प चुनिए। 

    मैं दिखाना चाहती हूँ कि हम आलोचनात्मक शिक्षाशास्त्र के जरिए चीजों पर पर्दा डालने की कोशिश नहीं करते, क्योंकि अब तो यही चलन बन गया है। हम आमतौर पर कहते हैं - अरे सीखने का कितना ख़ुशनुमा माहौल है और देखो, बच्चे कैसे-कैसे प्रयोग कर रहे हैं,मगर अब ये ख़ुशनुमा ढंग से सीखना भी एक ढर्रा बन गया है, इसको बहुत बेजान बना दिया गया है। हम अकसर सोचते हैं कि बस कोई गतिविधि करना ही काफी है, भले ही वो बिल्कुल निरर्थक हो, भले ही बच्चे उसके जरिए कुछ न सीख रहे हों। बस गतिविधियाँ करवाने की मारामारी मची हुई है। आज हमारे यहाँ यही हालात हैं। इसलिए मुझे लगता है कि हमें इस बारे में एक नए सिरे से सोचना चाहिए। बेशक, गतिविधि का महत्त्व है मगर बच्चों को वो चीजे मत सिखाइए जो बाद में आनी हैं। मसलन, उन्हें नंबर लाइन सिखाकर उसके आधार पर टाइम लाइन की बात मत कीजिए। हर चीज को एक संदर्भ में कीजिए। इसकी वजह यह है कि बच्चे इसी तरह सीखते हैं। संख्याएँ संदर्भ से ही आती हैं। संख्या एक बहुत अमूर्त धारणा है। एक बच्चे के लिए ‘दो’ समझना अमूर्त बात है। वह कैसे समझेगा कि किसी चीज के ‘दो’ होने का क्या मतलब है?

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    ‘हालात’ का समानार्थी है।

    Solutions

    समानार्थी शब्दों के अर्थ लगभग समान होते हैं। अतः ‘हालात’ का समान अर्थ "स्थिति" है हालात का अर्थ - दशाओं की समष्टि , उनका सम्मिलित रूप।

     

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