Please wait...

CTET 2019 Hindi Test - 8
Result
CTET 2019 Hindi Test - 8
  • /

    Score
  • -

    Rank
Time Taken: -
  • Question 1/10
    1 / -0

    Directions For Questions

    गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित में सबसे उचित विकल्प को चुनिए। 

    कार्तिकी पूर्णिमा इस देश की बहुत पवित्र तिथि है। इस दिन सारे भारतवर्ष में कोई-न-कोई उत्सव, मेला, स्नान या अनुष्ठान होता है। शरतकाल का पूर्ण चन्द्रमा इस दिन अपने पुरे वैभव पर होता है। आकाश निर्मल, दिशाएँ प्रसन्न, वायुमण्डल शान्त, पृथ्वी हरी-भरी, जलप्रवाह मृदु-मंथर हो जाता है। कुछ आश्चर्य नहीं कि इस दिन मनुष्य का सामूहिक चित्त उदेलित हो उठे। इसी दिन महान गुरु नानकदेव के आविर्भाव का उत्सव मनाया जाता है। आकाश में जिस प्रकार षोडशकला से पूर्ण चन्द्रमा अपनी कोमल स्निग्ध किरणों से प्रकाशित होता ह। उसी प्रकार मानव चित्त में भी किसी उज्जवल प्रसन्न ज्योतिपुंज का आविर्भाव होना स्वाभाविक है। गुरु नानकदेव ऐसे ही षोडश कला से पूर्ण स्निग्ध ज्योति महामानव थे। लोकमानस में अर्से से कार्तिकी पूर्णिमा के साथ गुरु के आविर्भाव का सम्बन्ध जोड़ दिया गया है। गुरु किसी एक ही दिन को पार्थिव शरीर में आविर्भूत हुए होंगे, पर भक्तों के चित्त में वे प्रतिक्षण प्रकट हो सकते हैं। पार्थिव रूप को महत्व दिया जाता है, परन्तु प्रतिक्षण आविर्भूत होने को आध्यात्मिक द्रष्टि से अधिक महत्व मिलना चाहिए। इतिहास के पण्डित गुरु के पार्थिव शरीर के आविर्भाव के विषय में वाद-विवाद करते रहें, इस देश का सामूहिक मानव चित्त उतना महत्त्व नहीं देता। 
    गुरु जिस किसी भी शुभ क्षण में चित्त में आविर्भूत हो जाये, वही क्षण उत्सव का है, वही क्षण उल्लसित कर देने के लिए पर्याप्त है। ‘नवो नवो भवति जायमान:’ – गुरु तुम प्रतिक्षण चित्तभूमि में आविर्भूत होकर नित्य नवीन हो रहे हो। हजारों वर्ष से शरतकाल की यह सर्वाधिक प्रसन्न तिथि प्रभामण्डित पूरनचंद के साथ उतनी ही मीठी ज्योति के धनी महामानव का स्मरण कराती रही है। इस चन्द्रमा के साथ महामानवों का सम्बन्ध जोड़ने में इस देश का समष्टि चित्त आहाद का अनुभव करता है। हम ‘रामचन्द्र’, ‘कृष्णचन्द्र’ आदि कहकर इसी आह्राद को प्रकट करते हैं। गुरु नानकदेव के साथ इस पूर्णचन्द्र का सम्बन्ध जोड़ना भारतीय जनता के मानस के अनुकूल है। आज वह अपना आह्राद प्रकट करती है।

    ...view full instructions


    पवित्र शब्द में कौन सी सन्धि है?

    Solutions

    पवित्र शब्द में आयादि सन्धि है। जब ए, ऐ, ओ, औ के बाद असमान स्वर आने पर ए का अय, ऐ का आय, और ओ का अव और औ का आव हो जाता है। जैसे : पो + इत्र = पवित्र, पो + अन = पावन

     

  • Question 2/10
    1 / -0

    Directions For Questions

    गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित में सबसे उचित विकल्प को चुनिए। 

    कार्तिकी पूर्णिमा इस देश की बहुत पवित्र तिथि है। इस दिन सारे भारतवर्ष में कोई-न-कोई उत्सव, मेला, स्नान या अनुष्ठान होता है। शरतकाल का पूर्ण चन्द्रमा इस दिन अपने पुरे वैभव पर होता है। आकाश निर्मल, दिशाएँ प्रसन्न, वायुमण्डल शान्त, पृथ्वी हरी-भरी, जलप्रवाह मृदु-मंथर हो जाता है। कुछ आश्चर्य नहीं कि इस दिन मनुष्य का सामूहिक चित्त उदेलित हो उठे। इसी दिन महान गुरु नानकदेव के आविर्भाव का उत्सव मनाया जाता है। आकाश में जिस प्रकार षोडशकला से पूर्ण चन्द्रमा अपनी कोमल स्निग्ध किरणों से प्रकाशित होता ह। उसी प्रकार मानव चित्त में भी किसी उज्जवल प्रसन्न ज्योतिपुंज का आविर्भाव होना स्वाभाविक है। गुरु नानकदेव ऐसे ही षोडश कला से पूर्ण स्निग्ध ज्योति महामानव थे। लोकमानस में अर्से से कार्तिकी पूर्णिमा के साथ गुरु के आविर्भाव का सम्बन्ध जोड़ दिया गया है। गुरु किसी एक ही दिन को पार्थिव शरीर में आविर्भूत हुए होंगे, पर भक्तों के चित्त में वे प्रतिक्षण प्रकट हो सकते हैं। पार्थिव रूप को महत्व दिया जाता है, परन्तु प्रतिक्षण आविर्भूत होने को आध्यात्मिक द्रष्टि से अधिक महत्व मिलना चाहिए। इतिहास के पण्डित गुरु के पार्थिव शरीर के आविर्भाव के विषय में वाद-विवाद करते रहें, इस देश का सामूहिक मानव चित्त उतना महत्त्व नहीं देता। 
    गुरु जिस किसी भी शुभ क्षण में चित्त में आविर्भूत हो जाये, वही क्षण उत्सव का है, वही क्षण उल्लसित कर देने के लिए पर्याप्त है। ‘नवो नवो भवति जायमान:’ – गुरु तुम प्रतिक्षण चित्तभूमि में आविर्भूत होकर नित्य नवीन हो रहे हो। हजारों वर्ष से शरतकाल की यह सर्वाधिक प्रसन्न तिथि प्रभामण्डित पूरनचंद के साथ उतनी ही मीठी ज्योति के धनी महामानव का स्मरण कराती रही है। इस चन्द्रमा के साथ महामानवों का सम्बन्ध जोड़ने में इस देश का समष्टि चित्त आहाद का अनुभव करता है। हम ‘रामचन्द्र’, ‘कृष्णचन्द्र’ आदि कहकर इसी आह्राद को प्रकट करते हैं। गुरु नानकदेव के साथ इस पूर्णचन्द्र का सम्बन्ध जोड़ना भारतीय जनता के मानस के अनुकूल है। आज वह अपना आह्राद प्रकट करती है।

    ...view full instructions


    शरदकाल का चन्द्रमा किस दिन अपने पुरे वैभव में होता है?

    Solutions

    शरदकाल का चन्द्रमा कार्तिक पूर्णिमा के दिन पूरे वैभव पर होता है। आकाश निर्मल दिशाएँ प्रसन्न वायुमण्डल शांत, पृथ्वी हरी-भरी, जल प्रवाह मृदु-मंथर हो जाता है, और चारो और कार्तिक पूर्णिमा की किरणें फैली होती है।

     

  • Question 3/10
    1 / -0

    Directions For Questions

    गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित में सबसे उचित विकल्प को चुनिए। 

    कार्तिकी पूर्णिमा इस देश की बहुत पवित्र तिथि है। इस दिन सारे भारतवर्ष में कोई-न-कोई उत्सव, मेला, स्नान या अनुष्ठान होता है। शरतकाल का पूर्ण चन्द्रमा इस दिन अपने पुरे वैभव पर होता है। आकाश निर्मल, दिशाएँ प्रसन्न, वायुमण्डल शान्त, पृथ्वी हरी-भरी, जलप्रवाह मृदु-मंथर हो जाता है। कुछ आश्चर्य नहीं कि इस दिन मनुष्य का सामूहिक चित्त उदेलित हो उठे। इसी दिन महान गुरु नानकदेव के आविर्भाव का उत्सव मनाया जाता है। आकाश में जिस प्रकार षोडशकला से पूर्ण चन्द्रमा अपनी कोमल स्निग्ध किरणों से प्रकाशित होता ह। उसी प्रकार मानव चित्त में भी किसी उज्जवल प्रसन्न ज्योतिपुंज का आविर्भाव होना स्वाभाविक है। गुरु नानकदेव ऐसे ही षोडश कला से पूर्ण स्निग्ध ज्योति महामानव थे। लोकमानस में अर्से से कार्तिकी पूर्णिमा के साथ गुरु के आविर्भाव का सम्बन्ध जोड़ दिया गया है। गुरु किसी एक ही दिन को पार्थिव शरीर में आविर्भूत हुए होंगे, पर भक्तों के चित्त में वे प्रतिक्षण प्रकट हो सकते हैं। पार्थिव रूप को महत्व दिया जाता है, परन्तु प्रतिक्षण आविर्भूत होने को आध्यात्मिक द्रष्टि से अधिक महत्व मिलना चाहिए। इतिहास के पण्डित गुरु के पार्थिव शरीर के आविर्भाव के विषय में वाद-विवाद करते रहें, इस देश का सामूहिक मानव चित्त उतना महत्त्व नहीं देता। 
    गुरु जिस किसी भी शुभ क्षण में चित्त में आविर्भूत हो जाये, वही क्षण उत्सव का है, वही क्षण उल्लसित कर देने के लिए पर्याप्त है। ‘नवो नवो भवति जायमान:’ – गुरु तुम प्रतिक्षण चित्तभूमि में आविर्भूत होकर नित्य नवीन हो रहे हो। हजारों वर्ष से शरतकाल की यह सर्वाधिक प्रसन्न तिथि प्रभामण्डित पूरनचंद के साथ उतनी ही मीठी ज्योति के धनी महामानव का स्मरण कराती रही है। इस चन्द्रमा के साथ महामानवों का सम्बन्ध जोड़ने में इस देश का समष्टि चित्त आहाद का अनुभव करता है। हम ‘रामचन्द्र’, ‘कृष्णचन्द्र’ आदि कहकर इसी आह्राद को प्रकट करते हैं। गुरु नानकदेव के साथ इस पूर्णचन्द्र का सम्बन्ध जोड़ना भारतीय जनता के मानस के अनुकूल है। आज वह अपना आह्राद प्रकट करती है।

    ...view full instructions


    कार्तिक पूर्णिमा को चन्द्रमा कितनी कला से अंलकृत होकर चमकता है?

    Solutions

    कार्तिक पूर्णिमा को चन्द्रमा 16 कलाओं से अलंकृत होकर चमकता हैं। उसी प्रकार मानव चित्त में उज्जवल ज्योति पुंज का आविर्भाव होना स्वाभाविक है। गुरु नांक देव ऐसे ही षोडश कला से पूर्ण महामानव थे।

     

  • Question 4/10
    1 / -0

    Directions For Questions

    गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित में सबसे उचित विकल्प को चुनिए। 

    कार्तिकी पूर्णिमा इस देश की बहुत पवित्र तिथि है। इस दिन सारे भारतवर्ष में कोई-न-कोई उत्सव, मेला, स्नान या अनुष्ठान होता है। शरतकाल का पूर्ण चन्द्रमा इस दिन अपने पुरे वैभव पर होता है। आकाश निर्मल, दिशाएँ प्रसन्न, वायुमण्डल शान्त, पृथ्वी हरी-भरी, जलप्रवाह मृदु-मंथर हो जाता है। कुछ आश्चर्य नहीं कि इस दिन मनुष्य का सामूहिक चित्त उदेलित हो उठे। इसी दिन महान गुरु नानकदेव के आविर्भाव का उत्सव मनाया जाता है। आकाश में जिस प्रकार षोडशकला से पूर्ण चन्द्रमा अपनी कोमल स्निग्ध किरणों से प्रकाशित होता ह। उसी प्रकार मानव चित्त में भी किसी उज्जवल प्रसन्न ज्योतिपुंज का आविर्भाव होना स्वाभाविक है। गुरु नानकदेव ऐसे ही षोडश कला से पूर्ण स्निग्ध ज्योति महामानव थे। लोकमानस में अर्से से कार्तिकी पूर्णिमा के साथ गुरु के आविर्भाव का सम्बन्ध जोड़ दिया गया है। गुरु किसी एक ही दिन को पार्थिव शरीर में आविर्भूत हुए होंगे, पर भक्तों के चित्त में वे प्रतिक्षण प्रकट हो सकते हैं। पार्थिव रूप को महत्व दिया जाता है, परन्तु प्रतिक्षण आविर्भूत होने को आध्यात्मिक द्रष्टि से अधिक महत्व मिलना चाहिए। इतिहास के पण्डित गुरु के पार्थिव शरीर के आविर्भाव के विषय में वाद-विवाद करते रहें, इस देश का सामूहिक मानव चित्त उतना महत्त्व नहीं देता। 
    गुरु जिस किसी भी शुभ क्षण में चित्त में आविर्भूत हो जाये, वही क्षण उत्सव का है, वही क्षण उल्लसित कर देने के लिए पर्याप्त है। ‘नवो नवो भवति जायमान:’ – गुरु तुम प्रतिक्षण चित्तभूमि में आविर्भूत होकर नित्य नवीन हो रहे हो। हजारों वर्ष से शरतकाल की यह सर्वाधिक प्रसन्न तिथि प्रभामण्डित पूरनचंद के साथ उतनी ही मीठी ज्योति के धनी महामानव का स्मरण कराती रही है। इस चन्द्रमा के साथ महामानवों का सम्बन्ध जोड़ने में इस देश का समष्टि चित्त आहाद का अनुभव करता है। हम ‘रामचन्द्र’, ‘कृष्णचन्द्र’ आदि कहकर इसी आह्राद को प्रकट करते हैं। गुरु नानकदेव के साथ इस पूर्णचन्द्र का सम्बन्ध जोड़ना भारतीय जनता के मानस के अनुकूल है। आज वह अपना आह्राद प्रकट करती है।

    ...view full instructions


    प्रस्तुत गधांश में कार्तिक पूर्णिमा का सम्बन्ध किसके जन्मदिवस है?

    Solutions

    प्रस्तुत गधांश में कार्तिक पूर्णिमा का सम्बन्ध “गुरु नांक देव” के जन्म दिवस से सम्बन्धित है। गुरु किसी एक ही दिन पार्थिव शरीर में आविर्भूत हुए होगें पर भक्तों के चित्त में प्रतिक्षण प्रकट हो सकते है।

     

  • Question 5/10
    1 / -0

    Directions For Questions

    गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित में सबसे उचित विकल्प को चुनिए। 

    कार्तिकी पूर्णिमा इस देश की बहुत पवित्र तिथि है। इस दिन सारे भारतवर्ष में कोई-न-कोई उत्सव, मेला, स्नान या अनुष्ठान होता है। शरतकाल का पूर्ण चन्द्रमा इस दिन अपने पुरे वैभव पर होता है। आकाश निर्मल, दिशाएँ प्रसन्न, वायुमण्डल शान्त, पृथ्वी हरी-भरी, जलप्रवाह मृदु-मंथर हो जाता है। कुछ आश्चर्य नहीं कि इस दिन मनुष्य का सामूहिक चित्त उदेलित हो उठे। इसी दिन महान गुरु नानकदेव के आविर्भाव का उत्सव मनाया जाता है। आकाश में जिस प्रकार षोडशकला से पूर्ण चन्द्रमा अपनी कोमल स्निग्ध किरणों से प्रकाशित होता ह। उसी प्रकार मानव चित्त में भी किसी उज्जवल प्रसन्न ज्योतिपुंज का आविर्भाव होना स्वाभाविक है। गुरु नानकदेव ऐसे ही षोडश कला से पूर्ण स्निग्ध ज्योति महामानव थे। लोकमानस में अर्से से कार्तिकी पूर्णिमा के साथ गुरु के आविर्भाव का सम्बन्ध जोड़ दिया गया है। गुरु किसी एक ही दिन को पार्थिव शरीर में आविर्भूत हुए होंगे, पर भक्तों के चित्त में वे प्रतिक्षण प्रकट हो सकते हैं। पार्थिव रूप को महत्व दिया जाता है, परन्तु प्रतिक्षण आविर्भूत होने को आध्यात्मिक द्रष्टि से अधिक महत्व मिलना चाहिए। इतिहास के पण्डित गुरु के पार्थिव शरीर के आविर्भाव के विषय में वाद-विवाद करते रहें, इस देश का सामूहिक मानव चित्त उतना महत्त्व नहीं देता। 
    गुरु जिस किसी भी शुभ क्षण में चित्त में आविर्भूत हो जाये, वही क्षण उत्सव का है, वही क्षण उल्लसित कर देने के लिए पर्याप्त है। ‘नवो नवो भवति जायमान:’ – गुरु तुम प्रतिक्षण चित्तभूमि में आविर्भूत होकर नित्य नवीन हो रहे हो। हजारों वर्ष से शरतकाल की यह सर्वाधिक प्रसन्न तिथि प्रभामण्डित पूरनचंद के साथ उतनी ही मीठी ज्योति के धनी महामानव का स्मरण कराती रही है। इस चन्द्रमा के साथ महामानवों का सम्बन्ध जोड़ने में इस देश का समष्टि चित्त आहाद का अनुभव करता है। हम ‘रामचन्द्र’, ‘कृष्णचन्द्र’ आदि कहकर इसी आह्राद को प्रकट करते हैं। गुरु नानकदेव के साथ इस पूर्णचन्द्र का सम्बन्ध जोड़ना भारतीय जनता के मानस के अनुकूल है। आज वह अपना आह्राद प्रकट करती है।

    ...view full instructions


    आविर्भाव का विलोम शब्द है –

    Solutions

    आविर्भाव का विलोम शब्द “तिरोभाव” है। जबकि अन्य तीनों विकल्प आविर्भाव का पर्यायवाची शब्द है। आविर्भाव का अर्थ है। उत्पन्न होना या जन्म लेना आदि।

     

  • Question 6/10
    1 / -0

    Directions For Questions

    गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित में सबसे उचित विकल्प को चुनिए। 

    कार्तिकी पूर्णिमा इस देश की बहुत पवित्र तिथि है। इस दिन सारे भारतवर्ष में कोई-न-कोई उत्सव, मेला, स्नान या अनुष्ठान होता है। शरतकाल का पूर्ण चन्द्रमा इस दिन अपने पुरे वैभव पर होता है। आकाश निर्मल, दिशाएँ प्रसन्न, वायुमण्डल शान्त, पृथ्वी हरी-भरी, जलप्रवाह मृदु-मंथर हो जाता है। कुछ आश्चर्य नहीं कि इस दिन मनुष्य का सामूहिक चित्त उदेलित हो उठे। इसी दिन महान गुरु नानकदेव के आविर्भाव का उत्सव मनाया जाता है। आकाश में जिस प्रकार षोडशकला से पूर्ण चन्द्रमा अपनी कोमल स्निग्ध किरणों से प्रकाशित होता ह। उसी प्रकार मानव चित्त में भी किसी उज्जवल प्रसन्न ज्योतिपुंज का आविर्भाव होना स्वाभाविक है। गुरु नानकदेव ऐसे ही षोडश कला से पूर्ण स्निग्ध ज्योति महामानव थे। लोकमानस में अर्से से कार्तिकी पूर्णिमा के साथ गुरु के आविर्भाव का सम्बन्ध जोड़ दिया गया है। गुरु किसी एक ही दिन को पार्थिव शरीर में आविर्भूत हुए होंगे, पर भक्तों के चित्त में वे प्रतिक्षण प्रकट हो सकते हैं। पार्थिव रूप को महत्व दिया जाता है, परन्तु प्रतिक्षण आविर्भूत होने को आध्यात्मिक द्रष्टि से अधिक महत्व मिलना चाहिए। इतिहास के पण्डित गुरु के पार्थिव शरीर के आविर्भाव के विषय में वाद-विवाद करते रहें, इस देश का सामूहिक मानव चित्त उतना महत्त्व नहीं देता। 
    गुरु जिस किसी भी शुभ क्षण में चित्त में आविर्भूत हो जाये, वही क्षण उत्सव का है, वही क्षण उल्लसित कर देने के लिए पर्याप्त है। ‘नवो नवो भवति जायमान:’ – गुरु तुम प्रतिक्षण चित्तभूमि में आविर्भूत होकर नित्य नवीन हो रहे हो। हजारों वर्ष से शरतकाल की यह सर्वाधिक प्रसन्न तिथि प्रभामण्डित पूरनचंद के साथ उतनी ही मीठी ज्योति के धनी महामानव का स्मरण कराती रही है। इस चन्द्रमा के साथ महामानवों का सम्बन्ध जोड़ने में इस देश का समष्टि चित्त आहाद का अनुभव करता है। हम ‘रामचन्द्र’, ‘कृष्णचन्द्र’ आदि कहकर इसी आह्राद को प्रकट करते हैं। गुरु नानकदेव के साथ इस पूर्णचन्द्र का सम्बन्ध जोड़ना भारतीय जनता के मानस के अनुकूल है। आज वह अपना आह्राद प्रकट करती है।

    ...view full instructions


    वाद-विवाद शब्द में कौन सा चिन्ह है?

    Solutions

    वाद-विवाद शब्द में योजक चिन्ह है। योजक चिन्ह सामान्यत: दो शब्दों को जोड़ता हैं।और दोनों को मिलाकर समस्त पद बनाता है, लेकिन दोनों का स्वतंत्र अस्तित्व बना रहता है। जैसे देर-स्वर, आगा – पिछा, ऊंच, नीच आदि।

     

  • Question 7/10
    1 / -0

    Directions For Questions

    गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित में सबसे उचित विकल्प को चुनिए। 

    कार्तिकी पूर्णिमा इस देश की बहुत पवित्र तिथि है। इस दिन सारे भारतवर्ष में कोई-न-कोई उत्सव, मेला, स्नान या अनुष्ठान होता है। शरतकाल का पूर्ण चन्द्रमा इस दिन अपने पुरे वैभव पर होता है। आकाश निर्मल, दिशाएँ प्रसन्न, वायुमण्डल शान्त, पृथ्वी हरी-भरी, जलप्रवाह मृदु-मंथर हो जाता है। कुछ आश्चर्य नहीं कि इस दिन मनुष्य का सामूहिक चित्त उदेलित हो उठे। इसी दिन महान गुरु नानकदेव के आविर्भाव का उत्सव मनाया जाता है। आकाश में जिस प्रकार षोडशकला से पूर्ण चन्द्रमा अपनी कोमल स्निग्ध किरणों से प्रकाशित होता ह। उसी प्रकार मानव चित्त में भी किसी उज्जवल प्रसन्न ज्योतिपुंज का आविर्भाव होना स्वाभाविक है। गुरु नानकदेव ऐसे ही षोडश कला से पूर्ण स्निग्ध ज्योति महामानव थे। लोकमानस में अर्से से कार्तिकी पूर्णिमा के साथ गुरु के आविर्भाव का सम्बन्ध जोड़ दिया गया है। गुरु किसी एक ही दिन को पार्थिव शरीर में आविर्भूत हुए होंगे, पर भक्तों के चित्त में वे प्रतिक्षण प्रकट हो सकते हैं। पार्थिव रूप को महत्व दिया जाता है, परन्तु प्रतिक्षण आविर्भूत होने को आध्यात्मिक द्रष्टि से अधिक महत्व मिलना चाहिए। इतिहास के पण्डित गुरु के पार्थिव शरीर के आविर्भाव के विषय में वाद-विवाद करते रहें, इस देश का सामूहिक मानव चित्त उतना महत्त्व नहीं देता। 
    गुरु जिस किसी भी शुभ क्षण में चित्त में आविर्भूत हो जाये, वही क्षण उत्सव का है, वही क्षण उल्लसित कर देने के लिए पर्याप्त है। ‘नवो नवो भवति जायमान:’ – गुरु तुम प्रतिक्षण चित्तभूमि में आविर्भूत होकर नित्य नवीन हो रहे हो। हजारों वर्ष से शरतकाल की यह सर्वाधिक प्रसन्न तिथि प्रभामण्डित पूरनचंद के साथ उतनी ही मीठी ज्योति के धनी महामानव का स्मरण कराती रही है। इस चन्द्रमा के साथ महामानवों का सम्बन्ध जोड़ने में इस देश का समष्टि चित्त आहाद का अनुभव करता है। हम ‘रामचन्द्र’, ‘कृष्णचन्द्र’ आदि कहकर इसी आह्राद को प्रकट करते हैं। गुरु नानकदेव के साथ इस पूर्णचन्द्र का सम्बन्ध जोड़ना भारतीय जनता के मानस के अनुकूल है। आज वह अपना आह्राद प्रकट करती है।

    ...view full instructions


    गुरु नानक देव के साथ किसका सम्बन्ध जोड़ना भारतीय जनता के अनुकूल है?

    Solutions

    गुरु नानक देव के साथ पूर्णचन्द्र का सम्बन्ध जोड़ना भारतीय जनता के मानस के अनुकूल है। आज वह अपना आह्लाद प्रकट करती है। जिस प्रकार चन्द्रमा की किरणें स्वच्छ चाँदनी विखेरती है। उसी प्रकार गुरुनानक देव का व्यक्तित्व अपनी यश रुपी कीर्ति के रूप में फैली हुई है।

     

  • Question 8/10
    1 / -0

    पठन प्रक्रिया का प्रांरम्भिक चरण है ।

    Solutions

    पढ़ने का लक्ष्य अर्थ समझना मात्र नहीं होता है बल्कि अर्थ को आत्मसात कर सन्दर्भ के साथ जोड़ना भी होता है।किसी शब्द रचना व उच्चारण रूप के प्रति जो मानसिक बिम्ब बनता है उसे हम प्रत्याभिज्ञान कहते है।

     

  • Question 9/10
    1 / -0

    सुमन बचपन से ही गुजराती बोल समझ लेती है। वह कभी विद्यालय नहीं जाती यह उदाहरण है।

    Solutions

    अर्जन का तात्पर्य है की अर्जित करना किसी भी प्रकार के अधिगम की प्रक्रिया जीवनभर चलती रहती है। भाषा के संदर्भ में भी यह बात लागू होती है। किन्तु जहाँ अन्य प्रकार के ज्ञान का अधिगम अनायास भी संभव है। वही भाषा का अधिगम स्वयं के प्रयासों तथा इसे सीख सकने वाली वातावरणजन्य परिस्थितियों में ही संभव है। भाषा का अर्जन अनुकरण द्वारा होता है।

     

  • Question 10/10
    1 / -0

    अर्थ की गहनता को समझने में कौन-सी पद्धति सर्वाधिक रूप से सहायक है?

    Solutions

    अर्थ की गहनता को समझने के लिए अधिक से अधिक मौन पठन का इस्तेमाल करना चाहिए। मौन पठन से शब्दों को मन ही मन पढ़कर समझते हुए आगे वाचन करते हैं। इसमें पढ़ने की गति में भी वृद्धि होती है तथा समझने की क्षमता बढ़ जाती है।

     

User Profile
-

Correct (-)

Wrong (-)

Skipped (-)


  • 1
  • 2
  • 3
  • 4
  • 5
  • 6
  • 7
  • 8
  • 9
  • 10
Get latest Exam Updates
& Study Material Alerts!
No, Thanks
Click on Allow to receive notifications
×
Open Now