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• पहला गिरमिटिया उपन्यास की रचना 1999 में गिरिराज किशोर ने की। इस उपन्यास का नायक मोहनदास है।
• महात्मा गांधी के दक्षिण अफ्रीका के जीवन संघर्ष पर पहला गिरमिटिया उपन्यास आधारित है।
• गिरिराज किशोर के अन्य उपन्यास हैं- लोग (1966), चिड़ियाघर (1968), यात्राएं (1971), ढाई घर (1991) आदि।
काव्य का वह गुण जो चित्त में तेज एवं स्फूर्ति का संचार करता है वह ओजगुण कहलाता है। ओज गुण में ट, ठ,ड, प, फ आदि कठोर वर्गों का प्रयोग किया जाता है।
'अष्टछाप' के कवि -
सूरदास जी
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वाह ! ये तो किसी अजूबे से कम नहीं।" वाक्य में वाह! शब्द का प्रयोग किया गया है। इन शब्द से हर्ष की भावना व्यक्त हो रही है। अतः ये शब्द विस्मयदिबोधक के अंतर्गत आयेंगे।विस्मयादिबोधक - ऐसे शब्द जो वाक्य में आश्चर्य, हर्ष, शोक, घृणा आदि भाव व्यक्त करने के लिए प्रयुक्त हों, वे विस्मयादिबोधक कहलाते हैं। विस्मयादिबोधक के प्रकार -1.शोकबोधक2.तिरस्कारबोधक3.स्वीकृतिबोधक4.विस्मयादिबोधक5.संबोधनबोधक6.हर्षबोधक7.भयबोधक
मिश्र वाक्य - ऐसे वाक्य जिनमें सरल वाक्य के साथ साथ कोई भी दूसरा उपवाक्य शामिल हो, उन वाक्य को मिश्र वाक्य कहा जाता है।
मिश्र वाक्य के निर्माण में प्रधान वाक्य और आश्रित उपवाक्य को जोड़ने के लिए बहुत सारे संयोजक अव्यय का प्रयोग होता है। (कि, जो, क्योंकि, जितना, उतना, जैसा, वैसा, जब)
अन्य विकल्प –अपना कार्य पूर्ण करो और घर जाओ। - संयुक्त वाक्यआदित्य या तो स्वयं आएगा या संदेश भेजेगा। - संयुक्त वाक्यजल्दी तैयार हो जाओ, नही ंतो ट्रेन चली जाएगी। - संयुक्त वाक्य
निम्न दी गयी पंक्ति में कौन-सा छंद है ?
यों किधर जा रहे हैं बिखर,कुछ बनता इससे कहीं।
संगठित ऐटमी रूप धर,शक्ति पूर्ण जीतो मही ॥
उल्लाला सम मात्रिक छन्द है। इसके प्रत्येक चरण में 13-13 मात्राओं के हिसाब से 26 मात्रायें तथा 15-13 के हिसाब से 28 मात्रायें होती हैं। इस तरह उल्लाला के दो भेद होते है। तथापि 13 मात्राओं वाले छन्द में लघु-गुरु का कोई विशेष नियम नहीं है लेकिन 11वीं मात्रा लघु ही होती है।15 मात्राओं वाले उल्लाला छन्द में 13 वीं मात्रा लघु होती है। 13 मात्राओं वाला उल्लाला बिल्कुल दोहे की तरह होता है,बस दूसरे चरण में केवल दो मात्रायें बढ़ जाती हैं। प्रथम चरण में लघु-दीर्घ से विशेष फर्क नहीं पड़ता। उल्लाला छन्द को चन्द्रमणि भी कहा जाता है।
दिए गए विकल्पों में d विकल्प में सही विराम चिन्ह है - यह तेरा व्रत है, तेरा प्रण है, तेरा कर्त्तव्य है। ओ भारत! अपने आपको इस काम के लिए असमर्थ न समझ!
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